Friday, 18 July 2008

ד"ר נבראס ג'אאט אפרידי


מחבר הספר "יהודי הודו ושבטי ישראל האבודים שבהודו, ד"ר נבראס ג'אאט אפרידי מלקנאו הוא חוקר בנושא לימודים הודים-יהודים. את הדוקטורט שלו קיבל מאוניברסיטת לקנאו בשנת 2005 ואת המשך לימודיו סיים באוניברסיטת תל אביב. ד"ר אפרידי הוא מרצה מבוקש בארה"ב, ישראל והודו, והוא הראשון שחוקר את הקשר בין שפת האורדו – השגורה על רוב המוסלמים בדרום יבשת אסיה – לבין השפה העברית. כעת עובד ד"ר אפרידי במרכז ללימודי תקשורת ופיתוח שבעיר פונה, הדוגל בשינוי חברתי מתוך ידע ותקשורת בין אישית, בתוכנית הידועה בשם "מרחב פתוח".
התעניינותו בעולם היהודי נבעה מתוך ששבטו – האפרידים – הוכרו על ידי חוקרים כצאצאיהם של בני שבט אפרים. זו מסורת עתיקה שמקובלת בין שבטי הפטאנים\פשטונים\פחטונים. כוונתו של ד"ר אפרידי להקדיש את חייו להמשך הקשר היהודי-הודי

Tuesday, 18 March 2008

Rabbi William Kloner's Message

Dr. Navras Jaat Aafreedi at the Shrine of the Book in Jerusalem, Israel with the Knesset, the Israeli parliament, in distant background

Dr. Navras Jaat Aafreedi at the Western Wall (Wailing Wall) in Jerusalem, Israel

The Truth, January 5, 2007, Vol. XCV, No. 2787

The scientific discovery of DNA in establishing beyond doubt the identity of an individual has revolutionized the solving of criminal cases. Criminals have been convicted who would have escaped the consequence of their evil deeds. DNA has come to the rescue of innocent victims of the law, even escaping capitol punishment. Yes, we rejoice that DNA has become a major player in the cause of justice.

DNA has been introduced into the long standing discussion and debate, “Who is a Jew”. Defining Jewishness has been critical in determining who has the right to become a citizen of Israel. The rabbinical establishment in Israel still holds sway in defining Jewishness according to their religious criteria. Long standing rabbinic communal contentions will be saved for a future message.

Novel claims of Jewishness have been brought to the fore by the introduction of DNA. About six years ago, a Mr. Haedrich, a Christian, while plodding through the Auschwitz Concentration Camp Memorial was struck, as he put it, by the “serendipitous feeling” that he might be Jewish. To satisfy this urge, this “epiphany” bordering apparently on obsession, he resorted to a DNA testing procedure. It confirmed he did indeed conform genetically to a “pedigree of Ashkenazi Polish Jews”. On the basis of his DNA report, Mr. Haedrich, a 44 year old successful nursing home director, applied for citizenship in the state of Israel under the Law of Return. Pleading his cause, Mr. Haedrich took out ads in Israeli and United States papers. He established “The Jewish by DNA Research Institute” to help others claiming to be Jewish on biological grounds. Though one might marvel that Mr. Haedrich would claim his “DNA biological Jewishness” in seeking Israeli citizenship, one would think he could resolve the issue and achieve his “Jewish goal” by simply converting. “As a matter of principle,” replied Mr. Haedrich, he will not convert because “he is already Jewish”.

Not surprisingly, the Israeli government denied his petition on the grounds that DNA does not prove Jewish identity. Nevertheless, Mr. Haedrich remains undeterred in his battle for “DNA Jewishness”.

Apparently, the DNA Jewish “epiphany” has not been restricted to a Christian from California, Mr. Haedrich. As far away as northern India, there has arisen the genetic link proposed by Dr. Navras Jaat Aafreedi. He has researched a link between Muslim Aafreedi Pathans and one of the 10 lost Tribes of Israel. Dr. Aafreedi has pursued this improbable genetic link in a scientific manner as a PhD researcher at the Tel Aviv University. He has pursued the possible Israelite decent among certain Indian Muslim groups. Dr. Aafreedi’s published work proposes that 650 out of 1500 members of his tribe may possess genetic material shared by 40 percent of Jews worldwide. How dramatic is the academic claim based on genetic DNA, that an Indian Moslem clan, no less, is the possible lost tribe of Ephraim?

Whereas the Christian Mr. Haedrich from California found his Jewish “epiphany” in Auschwitz, Dr. Aafreedi, a PhD historian, was introduced to his “Jewishness” by an uncle who told him as a child of their family and tribal connection to the Israelites. Tribal descendants, after settling in a hostile Muslim environment, lost their traditions. Surely, Dr. Aafreedi has aroused a Jewish DNA hornet’s nest, the stinging emissions of which he must surely have anticipated. Muslims being told they are really, Israelites, Jewish? Stinging remarks from “Moslem Jews” were ready at hand. “There were those who looked at my research as a Zionist conspiracy against Islam, said Dr. Aafreedi. “They felt I was trying to deprive Islam of its bravest followers by converting them to Judaism, attempting to convince them their Jewish heritage was just another forum of conversion”.

This “DNA Jewish” factor is an irony touched with humor, but the more serious aspects of “Who is a Jew” and the genetic factor will be explored further in a later Truth issue. In the meantime, some Jewish humor makes a subtle but significant point. A Jewish business executive on a trip to Japan, as was his practice in New York, sought out a Japanese synagogue for his Sabbath observance. Happily, he found a wonderful Sabbath service, the Hebrew and the ritual just like his service at home with one exception. All the worshippers were oriental in appearance with excellent Hebrew recitation and participation. Wishing to introduce himself as a Jew from New York City, he approached the rabbi. The rabbi gladly wished him a “good Shabos” and remarked, “Strange you don’t look Jewish.”

Sunday, 16 March 2008

आम ही नहीं, आफरीदी भी

येरुशलम में डॉ नवरस आफरीदी

फर्जंद अहमद, इंडिया टुडे , १० अक्टूबर २००६


एक नौजवान शोधकर्ता ने इसराइल की धरती से कभी गायब हुए एक कबीले के वंशजों को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सेट धूल-ढूस्रीत कस्बे में खोज निकाला


इस ज़माने में भी बदल (बदला) , नन्वातई (शरण) अउर मेल्मास्ताया (मेजबानी) नाम के तीन शब्दों से परिभाषित होने वाली अपनी आन-बाण-शान को बचाने के लिए जीने-मरने वाले आफ्रीदियों के विचित्र संसार में आपका स्वागत है। ये लडाकू पठान क़बायली अफगानिस्तान- पाकिस्तान की सीमा पर फैले किसी ऊबड़-खाबड़ इलाके में नहीं, बल्कि नवाबी लख न ऊ के बाहरी हिस्से में बसे छोटे से कस्बे मलीहाबाद में रहते हैं, जो दुनिया भर में अपने मीठे तथा खुशबूदार दशहरी आम और उर्दू तथा फारसी की बहतरीन शायरी के लिए प्रसिद्ध है। इस धूल-ढूस्रीत कस्बे में घुसते ही बाब-ऐ-गोया नाम का एक विशाल तोरण द्वार आपका स्वागत करेगा। इसका यह नाम मशहूर योद्धा और शायर गोया के नाम पर है । कुछ ही फर्लांग दूर कसर-ऐ-गोया नामक २०० साल पुराना महल है। इसके लान में क़दम रखते की अस सलाम अले कउम की द्रिड आवाज़ आती है । लंबे, ९१ वर्षीय कवि कमाल खान अपने दीवान से उठकर खड़े हो जाते हैं और "सैफ- ओ - कलम की धरती पर आपका स्वागत है" कहते हुए हाथ मिलाते हैं। वह अवध के निवासी नहीं लगते। उन्हें देखकर यह भी नहीं लगता की उनकी उम्र ढल रही है। कस्बे के आफरीदी पठानों में से यह खान बड़े गर्व से याद करते हैं, "मैंने सूना है की हमारे पुरखे इसराइल के थे , पर हम यहूदी नहीं, आफरीदी हैं।"


दरअसल , यह सब पहले उन्हें परी कथाओं जैसा लगता था। पर एक गहन अध्धयन ने लगभग यह स्थापित कर दिया है की बहुत कम आबादी वाले आफरीदी पठान इज्राईलीयों के वंशज हैं। एक नौजवान नवरस आफरीदी के किए इस अध्धयन में , जिसे दा इंडियन ज्यूरी एंड दा सेल्फ-प्रोफेस्द लौस्त त्रैब्ज़ ऑफ इज्रैल नाम से ई-बुक के रूप में प्रकाशित किया गया है , इस बात की पुष्टी की गयी है की खान जिसे परी कथा समझते थे, वह हकीकत है। शोध के अनुसार, आफरीदी पठान इसराइल के लुप्त कबीलों में से एक के वंशज हैं। नवरस कहते हैं, "शोध का मुख्य उद्देश्य आफरीदी पठानों की वंश परम्परा को खोजने के अलावा मुसलमानों और यहूदियों के सम्बंदों के मिथक का पता लगाना था। अपने लंबे अध्धयन से में इस निष्कर्ष पर पहुंचा की यहूदियों के प्रति मुसलमानों की घृणा या मुसलमानों के प्रति यहूदियों की घृणा ज्यादातर सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है।" नवरस यह दावा भी करते हैं की दूसरे कई देशों में अपने सह्धार्मियों के विपरीत भारत के यहूदियों की स्थिति कुल मिलाकर सुखद है। भारत में यहूदियों के ३४ धर्मस्थल हैं, जिनमें से कईयों के प्रभारी मुसलमान हैं, जबकी मुम्बई में मुसलमान लड़कियों के लिए बने शैक्षिक संस्थान अंजुमन-ऐ-इस्लाम की प्रिन्सेपल यहूदी महिला थीं।darasl

नवरस का अध्धयन रोचक और कुछ हद तक मार्को पोलो के डिस्क्रिप्शन ऑफ़ डी वर्ल्ड की तरह प्रमाणिक है । पाकिस्तान के सरहदी सूबों में रहने वाले निष्ठुर पठानों तथा उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद (लख न ऊ) व कायमगंज (फर्रुखाबाद) के आफरीदी पठानों से इसराइल के नाते पर नवरस के सीमित विवरण को लेकर देर-सवेर बहस ज़रूर होगी । खासकर ऐसे समय में जब यहूदियों और मुसलमानों के बीच घृणा नए दौर में प्रवेश कर रही है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में इतिहास विभा के पूर्व अध्ध्यक्ष डॉ एस एन सिन्हा और लख न ऊ विश्व विद्यालय के मध्य यौगीन एवं आधुनिक भार्तिये इतिहास विभाग के अध्ध्यक्ष डॉ वी दी पांडे जैसे सरीखे इतिहासकारों और विद्वानों ने नवरस के अध्धयन को भारत के यहूदियों और उत्तर प्रदेश में उनके संपर्कों पर महत्त्व पूर्ण शोध माना है ।

यह अध्यन महज़ सिध्धान्तों और पाठ्य पुस्तकों की कहानियों पर आधारित नहीं है। निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए नवरस एक अंतर्राष्ट्रीय शोध दल बनाया , जिसमें सेंटर ऑफ़ नीयर एंड मिडल ईस्ट स्टडीज़ , लंदन यूनिवर्सिटी और रूस की भाषा वैज्ञानिक एवं इतिहासकार डॉ युलिया एगोरोवा को शामिल किया गया। आफ्रीदियों की इज्राएली वंश-परम्परा की पुष्टी के लिए इस दल ने मलीहाबाद की यात्रा की और पेट्रिक रूप से असम्भद्ध ५० आफरीदी पुरषों के डी एन ऐ नमूने लिए ।

अध्धयन से यह रहस्योद्घाटन हुआ है की कई मुसलमान समूह ख़ुद को इसराइल के कबीलों से जोड़ते हैं। बा ई बिल के मुताबिक , इसराइल (इब्राहिम के पोते याकूब का दूसरा नाम) के १२ कबीले थे, जो दो राज्यों में विभाजित थे - १० कबीलों वाला उत्तेरी राज्य , जिसका नाम इसराइल ही रहने दिया गया, और दक्षिणी राज्य। ईसा पूर्व ७३३ और ७२१ में इसराइल को तहस-नहस कर वहाँ के कबीलों को खदेड़ दिया गया । बाद में इन दस कबीलों को लुप्त मान लिया गया। लेकिन लुप्त कबीलों में से चार को भारत में पाया गया है। यह हैं आफरीदी, शिन्लुंग (पूर्वोत्तर भारत), युदु (कश्मीर) और गुंटूर के गैर-मुस्लिम कबीले । बहादुर योद्धा आफ्रीदियों को पठान, पख्तून और अफगान कहा जाता है और वे सफ़ेद कोह (अफगानिस्तान) तथा पेशावर (पाकिस्तान) की सीमायों के बीच ऊबड़-खाबड़ इलाकों में रहते हैं । इतिहासकारों का मानना है की अफगान इसराइल (याकूब) के वंशज हैं , लेकिन उनका नाम लुप्त कबीलों की सूची में दाल दिया गया । शोध के मुताबिक , पैगम्बर मुहमद के जीवन काल (६२२ ईसवी) में इसराइल के एक दर्जन काबाइली सरदारों कोण इस्लाम में दीक्षित किया गया और जब उन्हें प्रताडित किया जाने लगा टू वह पलायन कर गए, दूरी तरफ़ , कुछ अफान-पठानों का विश्वास है की वह इब्राहीम की दूसरी पत्नी बीबी कटोरा के वंशज हैं और उनके ६ बेटे तूरान (उत्तरी-पश्चिमी ईरान) में जाकर बस गए।

इस तरह वह इस शेत्र में आ गए जिसे उतर-पश्चिमी सीमा प्रांत और अफगानिस्तान के रूप में जाना जाता है। यही नहीं , वह ख़ुद में कानों भी बन गए , तूरान में आने और फिर आगे बढ़ने पर उन्हें फारसी में आफ्रीदन कहा गया, जिसका अर्थ 'नया आया हुआ शख्स' होता है । इस तरह उन्हें आफरीदी की उपाधी मिली । कई आफरीदी पठान अभी भी शबात और जन्म के ठीक आंठवें दिन खतना जैसी यहूदी परम्परा का पालन करते हैं।

मलीहाबाद में पठान आबादी १२०२ ईसवी में बसी थी , जब मुहम्मद बख्तुइयार खल्जी के हमले के बाद बख्तियार नगर बसाया गया। लेकिन ज्यादातर पठान आबादी १७वीन् शताब्दी के मध्य के लगभग आई आई और हर प्रवासी कुनबे ने मलीहाबाद के आस-पास १०-१२ गाँवों पर कब्जा कर लिया । मलीहाबाद में प्रवासी पठानों , खासकर आफ्रीदियों की सबसे बड़ी लहर एक शाब्दी बाद १७४८ और १७६१ के बीच अहमद शाह अब्दाली के ५ हमलों के दौरान आई । सं १७६१ में उन्होंने पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों को हरा दिया । उस समय अवध शिया नवाबों के आधीन था , जो नजफ़ के विख्यात सैय्यद परिवार के वंशज थे। मलेहाबाद और कायमगंज के कई इज्राएली - आफरीदी तलवार और कलम के बल बल पर काफ़ी मशहूर हुए। उन्होंने युद्ध, राजीती , साहित्य और खेलकूद में भी काफ़ी नाम कमाया। भारत के त्रितिये राष्ट्रपति और जामिया millia इस्लामिया के संस्थापक इज्राएली पठन डॉ जाकिर हुसैन फर्रुखाबाद के थे, इसी तरह मलीहाबाद के शायर और अवध के दरबारी, फौज के कमांडर तथा खैराबाद के गवर्नर नवां फकीर मुहम्मद खान 'गोया', बागी शायर जोश मलीहाबादी , टेनिस खिलाडी गॉस मुहमद खान और रंग कर्मी , लेखक व शायर अनवर नदीम पर इस इलाके को गर्व है। ख़ुद को बनी इसराइल(इसराइल की संतान) कहने वाले इज्राएली पठान अलीगढ और संभल में बस आये, अलीगढ़ के मौजूदा काजी मुहम्मद अजमल भी इज्राएली मूल के हैं।

कई लोगों का मानना है की युवा विद्वान् नवरस का अध्धयन मलीहाबाद के अनुवांशिक-ऐतिहासिक शोध में मील का पत्थर साबित हो सकताहै जो उसे इसराइल के कई लुप्त कबीलों के ज़माने से जोदेगा। बहरहाल , लखनऊ के एक कोने में यह कड़ी पायी गई है।

Saturday, 15 March 2008

तलाश अपनी जड़ों की

डॉ नवरस आफरीदी कुब्बतुस्सख्रा की मस्जीद के सामने येरूशलम, इसराइल में
मलीहाबाद को इसराइल से जोड़ता है एफ्राइम कबीला

अपराजीता श्रीवासतव, सिटी, हिंदुस्तान, लख, २४ अप्रैल, २००६

अगर कोई एक दम से पूछ बैठे की लख और इसराइल में कोई नाता है या नहीं. टू हम में से ज्यादातर लोगों का जवाब होगा 'नहीं'. थोडा रुकिए नाता टू है. इसराइल के लुप्त्प्राये कबीले 'एफ्राइम' की खासी आबादी आज अपने मलिहाबाद में है. इस हैरातान्गेज़ राज़ को खोला है अपने शहर के एक युवक ने. उस युवा ने इस विषय पर गहन शोध किया है. नवरस आफरीदी का शोध अपराजिता श्रीवास्तव की कलम से

मलीहाबाद में, अपनी दीलेरी और जानबाजी के लिए मशहूर , आफरीदी पठानों की छोटी सी आबादी रहती हैआफरीदी पठान मूल रूप से अफ्घान-पाक सीमा के पर्वतिये इलाके के रहने वाले हैं१७६१ के कुछ दशक पहले आफरीदी पठान यहाँ बसेआज हालत यह हैं की यह अपनी बुनियाद, अपनी जड़ों से बेखबर हैंयह लोग ख़ुद भी नहीं जानते की वे दुनिया के किस कोने से तालुक रखते हैंअपनी जड़ों से हजारों किलोमीटर दूर बसे इन लोगों का इतिहास खोजा है नवरस आफरीदी नेनवरस लखविश्वविद्यालय में शोध छात्र हैंनवरस आफरीदी के रीसर्च में निकल कर सामने आया है की यह आफरीदी पठान वास्तव में में इसराइल का लुप्त कबीला इफ्राइम है

नवरस के शोध 'भार्तिये यहूदी तथा भारत में इसराइल के लुप्त कबीले' में यह तथ्य उजागर हुए की ७२१ ईसा पूर्व में असीरियाई हमले के कारन इफ्राइम सहित दस कबीलों को इसराइल छोड़ना पडाइसके बाद यह कबीले , यहाँ के लोग कहाँ गए किसी को कुछ नहीं मालूम थाइस शोध में यह बात सामने आयी की असीरियाई हमले के बाद इस कबीले के कुछ लोग अफ्घान-पाक सीमा के पर्वतिये इलाके में बसेदस्तावेज़ इस और इशारा करते हैं की मलीहाबाद में पठान टैब से रह रहे हैं जब सं १२०२ के आस-पास मुहम्मद बख्तियार खल्जी के नाम पर बख्तियार्नगर गाँव बसा थावैसे अधिकतर पठान आबादी १७वीं शताब्दी के दौरान यहाँ आएसं १७४८ से १७६१ के बीच अहमद शाह अब्दाली की हमलों के दौरान आफरीदी पठान सैनीक भारत आए और यहाँ के होकर रह गएजब वे भारत के घैर-पठान मुसलमान इलाकों में आकर बसे टू उन्होनें यही उचित समझा की अपने इजराइली अतीत का उल्लेख ना करें / परिणाम स्वरूप उनकी आगामी नस्लें अपनी इज्राएली उत्पत्ति से अनजान की रह गयी

अपने शोध को पुख्ता करने के लिए नवरस ने ५० अलग-अलग आफरीदी पठान परिवारों के पुरषों के ड़ी एन इकखट्टे कीइन पर लंदन के एक अनुसंधान केन्द्र में विश्लीशन हो रहा हैआफरीदी पठानओं के इज्राएली सम्भंद को ड़ी एन की सहायता से सामने लाने के लिए नवरस ने लंदन विश्व विद्यालय के यहूदी इतिहास के प्रोफेसर टुदोर पार्फीट तथा रूस की भाषा विद इतिहासकार डॉ युलिया एगोरोव के साथ एक अन्तर राष्ट्रीय शोध दल का गठन कीया

आफरीदी पठानों के इज्राएली जुडाव को सामने लाने वाले डॉ नवरस आफरीदी ख़ुद आफरीदी पठान हैंनवरस बताते हैं, "जब में १२ साल का था टैब मेरे ताऊ ने मुझे बताया था की बहुत सम्भव है की हम इज्राएली मूल के आफरीदी पठान हैंबस तभी मैंने यह फैसला कर लिया था की अपनी जड़ों का पता ज़रूर लगाऊँगानवम्बर २००२ में मध्य कालीन आधुनिक भार्तिये इतिहास वीभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर वी ड़ी पांडे के नीरदेशन में अपना शोध शुरू कियाइसे पूरा होने में तीन साल लग गए२००५ में में नवरस को पी एच ड़ी की उपाधी प्रदान की गयीउत्तर प्रदेश में आफरीदी पठान मुख्य रूप से मलीहाबाद और फर्रुखाबाद जीले की कायमगंज तहसील में रहते हैंइसके अलावा रामपुर, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, बदायूं और हरदोई जीले में शाहाबाद में भी इनकी कुछ आबादी रहती है

नवरस से पहले इस शोध में उनके सहयोगी प्रोफेसर पारफीट मुम्बई, पूने, थाने, और अहमदाबाद में रह रहे ,००० बेनी इसराइल का सम्भंद यहूदियों से साबीत कर चुके हैंडॉ पारफीट का नाम अफ्रीका के लुप्त कबीले लिम्बा और यमन के प्राचीन नगर 'सेना' को खोजने के लिए भी लिया जाता हैपारफीट ने जेनेटिक शोधों के ज़रिये दवा किया है की वास्तव में मराठी यहूदी हजरत मूसा के भाई ऐरन के वंशज हैंदुनिया भर में छोटी-छोटी आबादी में रह रहे यहूदियों को खोज नीकआलने का काम आज से क़रीब १२-१३ साल पहले शुरू हो चुका है१९९३ में येरुशलम रिपोर्ट में एक लेख प्रकाशित हुआ जिस में पठानों की इज्राएली सम्भंद में गहन अध्यन थाइसके अलावा २००२ में अमेरीकी फ़िल्म निर्माता सिम्खा याकोवित्सी को पठानों की इज्राएली उत्पत्ती पर बने वृत्त चित्र लिए एमी पुरस्कार प्रदान किया गयाइसके अलावा स्कूल ऑफ ओरिएण्टल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ , लंदों में आफरीदी पठानों का इज्राएली सम्भंद स्थापीत करने के लिए शोध चल रहा हैयेरुशलम में बेन-ज्वी अनुसंधान से प्राप्त इसराइल के दूसरे राष्ट्रपती और विश्वविख्यात इतिहासकार यिजाक बेन-ज्वी की वर्ष १९५७ की प्रकाशित पुस्तक ' एक्जैलेद एंड दा रीडीम्द' में ऐसी एक दर्जन से अधीक यहूदी परम्पराओं और रस्मों के बारे में ज़िक्र किया है जो आफरीदी पठानों में में प्रचलित हैं

इसराइल में दुनिया भर में बसे यहूदियों को अपने वतन, अपने लोगों के बीच वापस बुलाने के लिए घर वापसी का कानून बनाया हैइसके बाद वहाँ के कई घैर-सरकारी संगठनों ने मलीहाबाद सहित भारत के अन्य इलाकों में रह रहे आफरीदी पठानों के वंशजों को निमंत्रण पत्र भेजा है

इसराइल के लुप्त कबीलों और यहूदियों को खोजने उन्हें अपने पूर्वजों की भूमि लौटाने का आमंत्रण देने वाली इज्राएली संस्था आमीशाव ने मलीहाबाद के कई लोगों को उनकी वर्तमान स्थीती से एक पायेदान ऊपर अपने समाज में स्थापित करने का भरोसा दिलाते हुए 'घर-वापसी' का संदेश भेजा है

तेल अवीव युनीव्र्सीती ने डॉ आफरीदी को आमंत्रित कीया है इज्रईली मूल के मुसलमानों पर पोस्ट-डोक्तोरल रीसर्च के लियेभारत के मानव वीकआस मंत्रालय ने स्कोलार्शीप के लिए मनोनीत कीया है

Thursday, 13 March 2008

Megkerult Efraim torzse? [Turkish]

Pathan ferfi

A nyomok Indiába vezetnek

http://www.ujexodus.hu/index.php?cikk=840

Egy indiai történész genetikai kapcsolatot talált saját észak-indiai törzse, a jelenleg muzulmán vallású afridi pathanok és Izrael tíz szétszóródott törzsének egyike között. Aafreedi tanulmánya szerint az afridi pathan törzs 1500 tagjából 650-nek olyan a genetikai állománya, amilyen a zsidóság negyven százalékának világszerte. Ha ez megerősítést nyer, akkor ezek a leletek bizonyíthatják az Efraim törzsével való rokonságot. Aafreedi doktori disszertációjához készítette a kutatást, de személyes indítékok is vezették. Gyermekkorában nagybátyja beszélt neki arról, hogy törzsük rokon az izraelitákkal. A történész magát világi humanistának tartja, aki nincs előítélettel a zsidókat illetően, ám ez a fajta magatartás nem jellemző törzsére, amely jelenleg inkább ellenséges Izraellel és a zsidósággal szemben. A pathanok új generációi ugyanis az ellenséges iszlám közegben elveszítették ősi tradíciójukat. Származásuk szájhagyomány útján adódott át apáról fiúra, de ma már csak a vének emlékeznek rá. Michael Freund, a Jerusalem Post munkatársa és a szétszóródott zsidók Izraelbe való visszatérését segítő Sávé Jiszraél Alapítvány elnöke szerint a pathanok asszimilációja nem meglepő: az iszlám fundamentalizmus mindent elkövetett, hogy kitörölje a pathanok emlékezetéből a zsidó gyökerek tudatát.

Tuesday, 11 March 2008

A Biblical Connection

Dudu Landoy, Dr. Navras Jaat Aafreedi and Mosh Savir in Lucknow

Dudu Landoy and Mosh Savir from Israel (left) and Col. Ahuja (right) with Khalid Wali Khan (centre) flanked by Khan's two sons

Dudu Landoy and Mosh Savir from Israel and Col. Ahuja in conversation with Qavi Kamaal Khan, 93, the oldest Afridi Pathan of Malihabad


Lucknow's Tehsil Malihabad To Be Part of Jewish Tourist Circuit

Times News Network, The Times of India, Lucknow, March 11, 2008

Known for its delightful mangoes, Malihabad, situated 25 km from the state capital, is all set to become a part of the Jewish tourist circuit in the country.


The tehsil houses 650 Afridi Pathans believed to be decedents of one of the ten lost Biblical Israelite tribes. The fact has prompted two leading Israeli travel companies to market Malihabad as a tourist destination for Jewish community world over with the theme “The Lost Tribe Challenge”.

As a first step in this direction, Mosh Savir of Shai Bar Ilan Geographical Tours and Dudu Landau of Eretz Ahavati Nature Tours recently toured Malihabad along with Indian tour operator Col SP Ahuja to conduct a ground survey for facilitating the first “theme tour”, expected in November 2008.

The tours will showcase the lifestyle of Afridi Pathans and include
dialogue between the natives and the visitors in addition to sightseeing, lectures and exposure to local handicraft such as Chikan and Zardozi.

Malihabad is also the birth place of famous Urdu poet Josh Malihabadi, who was also an Afridi Pathan. Another illustrious Afridi Pathan from Malihabad is Ghaus Mohammed Khan, first Indian to reach the Wimbledon quarter-finals in 1939.

The tour will also include Qayamganj in Farrukhbad district of UP. Qayamaganj has produced famous Afridi Pathan like Zakir Husain, India’s third President. While Afridi Pathans are Muslims, some of their old customs have slight resemblance with Israeli traditions.

“We have no intention of preaching Judaism. The expedition will help our people understand, enjoy and appreciate different cultural customs, practices and folklores,” explained Dudu Landau. Mosh Savir, on the other hand, felt that it will also increase the demand for special interest tourism.

History has it that the 10 Israelite tribes of the northern Kingdom of Israel were exiled by the Assyrians invaders in 721 BC. It is also believed that some of the descendants of the tribes settled in India.

“Pathan tribes came to India between 1202 AD and 1761 AD along with Muslim and Afghani invaders and settled in different parts of the country. Afridi Pathans of Malihabad came from the North Western Frontier Province, now in Pakistan,” claimed Navras Jaat Aafreedi, an Afridi Pathan himself, who has conducted a research which supports the theory of Jewish origin of the Afridis. “Afridi pathans are descedents of Ephraim Tribe, one of the lost tribes,” said Navras who was also a part of the ground survey.

However, today Afridi pathans are ignorant about their past and are averse to the idea of being linked with Jews. Hence there are apprehensions that such visits might invite opposition. But Navras says “India as a secular state provides Jews with an opportunity to understand Muslims closely which is not possible in Israel because of the Muslim-Jew confrontation”. For the last few years, Malihabad and Qayamganj have been centres of attraction for researchers interested in tracing lost tribes. In November 2002, a team headed by Prof Tudor Parfitt, director of the Centre of Jewish Studies, London University, had visited Malihabad to collect DNA samples of Afridi Pathans in order to confirm their putative Israeli descent. The results are still awaited. Eyal Beeri, from Lander Institute, Jerusalem had visited Malihabad in October 2007.

Apart from Malihabad and Qayamganj, the theme tours will also take tourists to areas inhabited by Bnei Menashes in Manipur and Mizoram. Beni Menashe is the name adopted by people who earlier belonged to Kuki, Chin and Lushai tribes of Northeast but now have embraced Judaism as they believe that they are decedents of Menashe, one of the lost Israelite tribes. In Hebrew, Beni Menashe means children of Menashe. Around 1,000 out of over 8,000 Beni Menashes of India have already settled in Israel.

Sunday, 2 March 2008

बुलावा आ रहा है इसराइल से


डॉ नवरस आफरीदी इज्राएली संसद के सामने राष्ट्रीय चिन्ह मनोराह के सामने येरूशलम, इसराइल में

योगेश मिश्र, आउटलुक साप्ताहिक, १० नवम्बर २००३

याद दिलाई जा रही है सदियों पहले के पुरखों की

अपने पुराने, बहुत पुराने बाशिंदों को वापस घर बुलाने की एक नई पहल शुरू की गई है. दुनिया भर में बिखरे इसराइल के इन मूल निवासियों में उर्दू के अजीम शायर पद्मभूषण जोश मलीहाबादी , १९३९ में विम्बिल्दों टेनिस टूर्नामेंट के कौर्टर फिनल तक पहुचने वाले पद्म श्री घुस मुहम्मद खान, आम के एक पेड़ में ३१५ प्रजातियाँ उगाने का कीर्तिमान स्थापित कर चुके हाजी कलीमुल्लाह खान और कभी बघ्बानी में खासा नाम कम चुके अब्दुल बारी खान के नाम अकेले उत्तर प्रदेश के मलिहाबाद से शामिल हैं. इसराइल में घर वापसी कानून लागू होने के बाद वहाँ के कई गैर-सरकारी संगठनों ने मलिहाबाद इलाके में रह रहे आफरीदी पठानों के वंशजों को विधिवत निमंत्रण पत्र भेजा है.

इन आफरीदी पठानों की इस्रेली पृष्ठभूमि की प्रमाणिकता जांचने-परखने के लिए लोंदों विश्व विद्यालय में यहूदी इतिहास के प्रोफेस्सर ९द्र० तुदोर पार्फित तथा रूस की भाषाविद और हिन्दी-उर्दू के अलावा कई एशियाई और एउरोपिये भाषाओं की ज्ञाता युलिया एगोरोव ने पिच्च्ले साल १४ नवम्बर को यहाँ का दौरा किया. इस दौरान इन लोगों ने डी.न.अ. जांच के लिए पचास विभिन आफरीदी परिवारों के पुरषों के नमूने लिए. डॉ पर्फित की ख्याति अफ्रीका के लुप्त कबीले लम्बा और यमन के प्राचीन नगर सेना को ढूँढ निकालने वाले के रूप में भी है. उनका मानना है की लाख नौ के समीप स्थित मलिहाबाद और फरुखाबाद के कायमगंज इलाके में रह रहे अल्प संख्यक समुदाये के लोग वस्तुतः इस्रेली मूल के यहूदी हैं. पर्फित ने जेनेटिक शोधों के ज़रिये दावा किया है की वास्तव में मराठी यहूदी हजरत मूसा के भाई एरों के वंशज हैं.

उर्दू शायर जोश मलीहाबादी के खानदान के नवरस आफरीदी ल ख नौ विश्व विद्यालय के मध्य युगीन और आधुनिक इतिहास विभाग से "भार्तिये यहूदी तथा भारत में इसराइल के लुप्त कबीले" विषये पर शोध कर रहे हैं. नवरस ने आउटलुक साप्ताहिक से कहा, "अपने पुरखों के बारे में जानने की तमन्ना के चलते हमने शोध के लिए यह विषय चुना." इसराइल के लुप्त कबीले और यहूदियों को खोजने और इन्हें अपनी पूर्व भूमि लौटने का आमंत्रण देने वाली इस्रेली संस्था आमिशाव ने नवरस और मलिहाबाद के कई लोगों को "वे जहाँ हैं, जिस स्थिति में हैं" उस से एक सीर्ही ऊपर अपने समाज में स्थापित करने का भरोसा दिलाते हुए घर वापसी का पैघाम भेजा है. १८ मार्च २००० को पेहली बार भेजे गए ख़त में कहा गया है की आफरीदी पठानों का मूल निवास स्थान अफ्घन-पक सीमा का पश्चिमी पर्वतिये इलाका है. पठानों का आफरीदी कबीला वास्तव में इफ्राइम है. इसराइल का एक लुप्त कबीला जिसे ७२२ ईसा पूर्व में असीरियाई आक्रमण के कारण इसराइल छोड़ना पड़ा और जो समय के साथ खो गया. कुछ आफरीदी पठान १७६१ ईसवी में पानीपत के तीसरे युद्ध में विजयी होने के बाद मलिहाबाद अ बसे. दो पन्ने के इस ख़त में इसराइल के दूसरे राष्ट्रपति और इतिहासकार यिजाक बेन जावी की एक दर्जन से अधिक पुस्तकों के दृष्टांत भी दिए गए हैं. इसमें यिजाक बेन ज्वी की पुस्तक डी एक्जैल्ड एंड डी रिदीम्द के पृष्ठ २०९ से २१९ तक का हवाला देते हुए बताया गया है की आफरीदी पठानों का मूल निवास इसराइल है और ये वास्तव में 'इफ्राइम' है.

इसके अलावा इसी काम में जुटी हुई एक अन्य संस्था 'बेत जूर' ने भी ७ जनवरी २००१ को घर वापसी की एक भावनात्मक अपील यहाँ के लोगों को घेजी है. इसराइल जा बसने की तमन्ना संजोये नवरस से इस्रेली संस्थाओं की काटो-किताबत जारी है. नवरस बताते हैं, "मैं जाना चाहता हो. मेरी प्रबल इच्छा है. अपनी जड़ों तक पहुँचने की तमन्ना किसे नहीं होती? और फिट मैं टू इतिहास का छात्र हूँ. लेकिन उनकी माँ इसके लिए बिल्कुल तय्यार नहीं हैं. वह चाहती हैं की उनका बेटा भारत में रहे. परन्तु दिलचस्प यह है की अपने बेटे को इसराइल ना भेजने के पीछे उनका तर्क है, "वहाँ बहुत असुरक्षा है." उधर शायर कवि कमल खान के नाती ने कहा, "अगर हमारा यहूदी साम्बअंध सिद्ध भी हो, टैब भी हममें इसराइल का ऐश्वर्या मंज़ूर नहीं." परन्तु लाख नौ विश्व विद्याला में पढ़ रही रौशनी मरियम कहती हैं, "सुनकर खुशी टू होती है की हमारे पूर्वज वहाँ से आए हैं. हमें वह स्थान देखकर प्रसन्नता ज़रूर होगी.

Friday, 18 January 2008

Looking for lost tribes of Israel in Malihabad

Eyal Beeri with 92-year-old Qavi Kamal Khan, the oldest Afridi Pathan of Malihabad

Dr. Navras Jaat Aafreedi in conversation with Eyal Beeri

92-year-old Qavi Kamaal Khan, the oldest Afridi Pathan/Pashtun of Malihabad

Ashish Tripathi, The Times of India, Lucknow, November 12, 2007


It was not just the delightful dussehri mangoes which made Eyal Beeri come all the way from Jerusalem to Malihabad, a township 25 kilometres from Lucknow. A librarian and student adviser in the Lander Institute of Jerusalem, the historian is the latest one to arrive in search of the lost tribes of Israel, which have brought many scholars from world over to India since ages. But Beeri’s visit is significant as he is the first Jew and Israeli to visit the Pathan settlement of Malihabad.


History has it that the 10 Israelite tribes of the northern Kingdom of Israel were exiled by the Assyrians invaders in 721 BC. The tribes eventually went into oblivion with the passage of time. Since then efforts are being made to track them down. It is also believed that some of the descendants of the tribes settled in India. Afridi Pathans of Malihabad are said to be one of them. Prof Tudor Parfitt and Dr Yulia Egorova of London University had visited Malihabad in 2002 to take DNA samples of the Afridi Pathans to ascertain whether they had an Israeli lineage or not.

In league with the famous losttribes-explorers like Benjamin of Tudela and Rabbi Eliyahu Avichail, Beeri arrived in India on September 16. During his three weeks expedition, he first visited Pathan settlements in Rajasthan. His second stop was Malihabad before leaving for Qayamganj in Farrukhabad. The purpose of his visit is to study the age-old customs and traditions of Pathans and find if they have any resemblance to the Israeli traditions. His objective was to educate the Pathans about Israel and to help them form relationship with
the Jewish community the world over.

“India fascinates me. I feel a positive energy inside me whenever I am here,” said Beeri recalling his earlier two visits. “My maternal grandfather had come from Baghdad to settle in Israel. He belonged to the famous Sassoon family of Jews, descendants of which are also settled in Mumbai. Perhaps this could be a reason why I feel at home in this country,” he said. Beeri is particularly interested in the lives and customs of the Muslim tribes. India provides him an opportunity to understand Muslims closely which is not possible in Israel because of the Muslim-Jew confrontation.

Beeri came across two Pathan tribes, Musakhel and Mohammedzai, living in villages around Jaipur and Ajmer. Some of the traditions followed by these tribes since ages have some resemblance, if not striking similarities, with that of Jews, he said. “One of the tribes had the custom of circumcising their male child six days after the birth. In Jews it is done eight days after the birth,” he said. “Pathans don’t eat camel meat, which is also forbidden for Jews. Like ‘Pathanwali’ in Pathans, Jews also have a code of conduct, ‘Torah Laws’, passed on from one generation to another,” he added.

In Malihabad, Beeri visited the family of Qavi Kamal Khan, now over 90-year-old and the eldest Afridi Pathan in the area. Khan was averse to the idea of being linked with Jews but he welcomed the Israeli guest with warmth. Beeri was escorted by a young research scholar Navras Jaat Aafreedi, an Afridi Pathan himself, who has conducted a research which supports the theory of Jewish origin of the Afridis. In fact, Navras said, some historians believe that the word “Pathan” has been derived from “Pithon”, the name of the great grandson of King Saul, the first King of Israel. Navras elaborated that many Pathan tribes came to India between 1202 AD and 1761 AD along with Muslim and Afghani invaders and later settled in different parts of the country. “Afridi Pathans of Malihabad came from the Khyber tribe of the North Western Frontier Province, now in Pakistan. There are historical texts which support Jewish origin of the Afridi Pathans,” he claimed. “But today they are ignorant about their Jewish origin and have even forgotten their ancestral language. They speak in local dialects and have produced great Urdu poets like Josh Malihabadi,” he added.